स्वतंत्रता संग्राम में धार्मिक एकता के लिए रक्षाबंधन का इस्तेमाल!

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स्वतंत्रता संग्राम में धार्मिक एकता के लिए रक्षाबंधन का इस्तेमाल

हमारा देश भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। सभी धर्मों के लोग यहां आपसी भाईचारे के साथ रहते आए हैं। आजादी की लड़ाई हो या कोई और महत्वपूर्ण घटना, समय समय पर भारतवर्ष ने सर्व धर्म एकता की मिसाल पेश की है।

हर साल जुलाई या अगस्त के महीने में हम लोग रक्षाबंधन मनाते हैं। इतिहास में ऐसी कई घटनाएं हैं जिसमें रक्षाबंधन से हमने हिंदू मुस्लिम एकता और आपसी सौहार्द का परिचय दिया। बहुत सी पौराणिक तथा ऐतिहासिक घटनाओं में रक्षाबंधन का महत्व हमने देखा है। भारतीय इतिहास में एक ऐसा भी किस्सा मिलता है जिसमें एक हिंदू रानी ने मुस्लिम बादशाह को अपने राज्य की रक्षा के लिए राखी भेजी थी। सर्व विदित है कि कैसे चित्तौड़ की रानी कर्मावती के द्वारा बहादुर शाह से अपनी रक्षा की प्रार्थना पर हुमायूं ने अपनी जी जान लगा दी थी।

आधुनिक इतिहास में भी एक ऐसी ही घटना का वर्णन मिलता है जिसमें इस पवित्र त्यौहार का उपयोग हिंदू-मुस्लिम एकता को दर्शाने के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों व तत्कालीन नेताओं ने किया। अपनी किताब ‘टैगोर बाय फायर साइड’ (Tagore by Fireside) में ए मजूमदार ने इस घटना के बारे में लिखा है कि उन्होंने रक्षाबंधन के इस धार्मिक त्यौहार को ‘धार्मिक अखंडता में एकता‘ के रूप में दिखाया और बंग-भंग (बंगाल विभाजन) को रोका।

बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में तत्कालीन बंगाल में राष्ट्रवादी अभियान अपने चरम पर थे। ब्रिटिश शासन की जड़ें इन अभियानों से हिलने लगी थी। बहुत सोच विचार तथा आपसी परामर्श के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने एक ऐसा निर्णय लिया जो इन अभियानों को रोक सकता था। निर्णय था बंगाल विभाजन का। अंग्रेजों के इस निर्णय का हालांकि बहुत विरोध हुआ। उस समय के बड़े नेता जैसे रविंद्र नाथ टैगोर आदि ने इसका सरेआम विरोध किया।

जून 1905 में असम में लॉर्ड कर्जन तथा कुछ मुस्लिम नेताओं में एक मीटिंग हुई। इस सभा में अंग्रेजों ने मुस्लिम नेताओं को यह यकीन दिला दिया कि उनके वजूद तथा पहचान बचाने के लिए एक अलग राज्य बनाना जरूरी है। योजना थी, असम तथा सिलहट के मुस्लिम बहुल इलाकों से उड़ीसा, बिहार तथा पश्चिम बंगाल के हिंदू बहुल इलाकों को अलग करने की।Rakhi

अगस्त 1905 में अंग्रेजी हुकूमत ने बंगाल विभाजन के आदेश पारित किए। यह आदेश अक्टूबर से लागू होने थे। जब यह आदेश पारित किया गया तो श्रावणमास चल रहा था तथा रक्षाबंधन का त्यौहार समीप आ रहा था। इस आदेश की अवमानना करने के लिए रविंद्र नाथ टैगोर ने एकता तथा भाईचारे के इस त्यौहार को सर्व धर्म एकता का त्यौहार बना दिया। उन्होंने रक्षा तथा एकता के धागे को हिंदू-मुस्लिम एकता के रूप में दिखाया तथा लोगों को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ साथ खड़े होने का आह्वान किया।

फिर क्या था टैगोर के इस आह्वान पर सैंकड़ों की तादाद में हिंदू-मुस्लिम सिलहट, ढाका तथा कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में सड़कों पर उतरे और अपनी एकता को दर्शाने के लिए एक दूसरे को राखी बांधी।

इस घटना के बाद हिंदू-मुस्लिम एकता का लगातार परिचय दोनों समुदायों ने दिया। पूर्वी तथा पश्चिम बंगाल में हिंदू मुसलमानों ने साथ मिलकर लगातार अंग्रेजी हुकूमत को निशाना बनाया। नतीजा, 1911 में बंगाल विभाजन के निर्णय को वापस ले लिया गया। हालांकि टैगोर जी की यह सोच बहुत छोटे समय के लिए थी क्योंकि धार्मिक नफरत के इसी विष ने 1947 में भारत विभाजन को जन्म दिया। तथापि इतिहास की इस घटना से आज भी हम लोग सीख ले सकते हैं।

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