नशे से हारती ममता

no nasha

आज लिखने चला हूं, मेरे गांव की एक कहानी

कहानी उस शक्स की, नशे में दौड़ती जिसकी जवानी

जिसको अब ना अपनी खबर और ना अपनों का ख्याल है

जिसकी बेरुखी जिंदगी में अब ना कोई आत्मीयता ना कोई मलाल है

हां वही, जिसने ममता को भी ना बख्शा, शराब के चक्कर में

सुना है, नशे में डूबे, उसके, उसी जैसे दोस्त कहते हैं, कोई नहीं तेरी टक्कर में

nasha

कभी, बहुत पहले, जब महज वो तुतलाता था, ना समझ आने वाली बातों को बार बार दोहराता था

तब वो मां का अचल प्रेम ही तो था, कि जो वो चाहता वो पाता था

कहानियां सुनाई गईं, चंदा दिखाए गए और इसी बहाने खिला दिए जाते कुछ निवाले

उसको कभी खरोंच आने ना दी, अपने पैरों के जिनके गए ना कभी छाले

मां, वो मोहब्बत होती है जो सब निभा जाती है, चुपचाप बिना अहसास कराए

आज वो भी दिखा रहे हैं उसे आंखें, जो जीवन भर डकारे हों उसका हिस्सा खाए

लोग दोष परवरिश को देते हैं, मगर फिर ये बताओ एक ही घर विभीषण और रावण कैसे हुए

अजी, असर सब संगत का है, सत संग का है, इसीलिए तो कहीं देवता तो कहीं दानव हुए

ये व्यथा थी ममता की, और नशे और क्रूरता के जाल में लिपटे उस लाल की

लड़ाई अगर इंसानी होती तो कब का जीत जाते, मगर ये तो चाल है मन रूपी काल की

 

नानी, जी हां, वही नानी जिसके ननिहाल के यहां बच्चे गर्मी की छुट्टियां होते ही,बस्ते में कुछ किताबें और उमंग लिए चल पड़ते हैं. नानी भी स्वागत को आतुर, अपने नन्हे राजकुमार और राजकुमारियों के लिए घी, माखन, मालपूए, पके और ताजा आम और ना जाने तरह तरह के पकवान पहले से ही तैयार रखती है.

 

nasha poem

ये कहानी है, साथ लगते गाँव की ऐसी ही एक नानी, गीता देवी जी की. गीता जी, जो अपने जीवन के नब्बे बसंत देख चुकी हैं. अगर इनके जीवन पर एक गौर की जाए, तो इनका जन्म आज़ादी के पहले वाले भारत में हुआ,  गुलाम भारत में अंग्रेजी कुशासन के बीच में उनका बचपन गरीबी में ही बीता, और फिर छोटी ही उम्र में उनकी शादी कर दी गई, शादी के कुछ अरसे बाद आजाद भारत में उनके पति, शिमला, हिमाचल प्रदेश में अपनी सब्जी की दुकान चलाने लगे, दुकान अच्छी चलने लगी, देखते ही देखते परिवार गरीबी और आर्थिक तंगी से निकल गया, हिमाचल परिवहन कि उस समय की उन चुनिंदा बसों में से एक में हर हफ्ते या महीने में दो बार तो पक्का मौसमी फल जैसे कि सेब, अंगूर, सीताफल और मेवे आदि गांव में भेजे जाते, उन फलों और मेवों को परिवार, पड़ोसियों, रिश्तेदारों और गांव में भी बांट दिया जाता था, देखते ही देखते परिवार की इज्जत गांव में एक उदाहरणीय परिवार की तरह हो गई, उनके चार लड़कियां और दो लड़के हुए, सबकी परवरिश खूब लाड़-प्यार से हुई, सब लड़कियों की अच्छे परिवारों में शादी कर दी गई, बड़ा लड़का अपने पिता के साथ सब्जी का कारोबार संभालने लगा, और छोटा पढ़ाई कर रहा था, पिता तबीयत खराब होने के चलते घर आ गए, और अब दुकान का पूरा भार बड़े लड़के के ऊपर आ गया, इसी बीच छोटा लड़का किसी कंपनी में नौकरी पर लग गया

नशा एक अभिशाप है और नाश का कारण भी, ये वाक्य ऊपर कथित परिवार में चरितार्थ हो गया, बड़े लड़के ने दुकान से खूब पैसा कमाया, लेकिन माया की दौड़ में जीने का सलीका भूल गया, नशे का आदी हो गया, नशे ने मानसिक संतुलन को खराब कर दिया, दुकान में हानि होने लगी, पैसा जुए में हार गया, देखते ही देखते दुकान बिक गई, मगर नशा यूं ही बरकरार रहा, छोटा लड़का भी शराब पीता था, इस गम को उनके पिता नहीं झेल पाए, वर्षों से जिस दुकान को अपने तजुर्बे, संयम और मेहनत से खड़ा किया था, आज वो नहीं रही थी, रिश्तेदारों ने परिवार को खड़ा करने की फिर कोशिश की,मगर नशे ने सब पर पानी फेर दिया, और एक दिन शराब ने बड़े बेटे की जान ले ली, दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई.

ज़रा देखें जिस घर में कभी दूध, दही और घी की नदियां बहती थीं, फल, सब्जी और मेवे भरे रहते थे, आज नशे ने उसे क्या बना दिया

आज सबका ख्याल रखने वाली नानी अपनों के बीच कहीं गुम है, कोई मदद के लिए कहता है तो हंस के टाल जाती हैं, दिल में अपार कोलाहल लिए परिवार के लिए जिए जा रही है, ये कुछ ऐसे किस्से हैं जो रोज समाज के बड़े और बनावटी शोर के नीचे दब जाते हैं,

नशा इंसान को हैवान बना देता है, उसमें करुणा नहीं रहती, वो ममता को हरा सकता है, वही ममता जिसके बिना संसार अधूरा है

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